छत्तीसगढ़राज्य

छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य की समृद्ध विरासत को मिला सम्मान, 26 पुस्तकों का विमोचन

Recognition for the rich heritage of Chhattisgarhi language and literature; 26 books released.

रायपुर: छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संरक्षण, संवर्धन तथा विकास को समर्पित राजभाषा आयोग के कार्यालय स्थापना दिवस 14 अगस्त के अवसर पर राजधानी रायपुर में गरिमामय साहित्यिक आयोजन हुआ। कार्यक्रम में प्रदेशभर से साहित्यकार, कवि, रचनाकार, भाषा-सेवी एवं साहित्य प्रेमी शामिल हुए। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ी भाषा की सेवा में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठ साहित्यकारों एवं भाषा-सेवियों का सम्मान किया गया। साथ ही राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित 26 पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम में विधायक मोतीलाल साहू, विधायक पुरन्दर मिश्रा, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति मनोज दयाल, संस्कृति विभाग के सचिव डॉ. एस. भारतीदासन, संस्कृति एवं राजभाषा संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा तथा राजभाषा आयोग की सचिव डॉ. अभिलाषा बेहार सहित प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार परदेशी राम वर्मा,अरुण निगम,मीर अली मीर, वरिष्ठ कवयित्री शशिकला दुबे, वीर अजीत शर्मा,शकुंतला तरार और सीमा निगम सहित प्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए साहित्यकारों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम को समृद्ध बनाया।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रचार-प्रसार, साहित्य सृजन और जनमानस तक भाषा की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में सेवानिवृत्त उद्घोषक, आकाशवाणी संजय पाण्डेय, वरिष्ठ दूरदर्शन उद्घोषक एवं पत्रकार ज्योति सिंह, सेवानिवृत्त कार्यक्रम अधिकारी, आकाशवाणी समीर शुक्ला, साहित्यकार चेतन भारती, रायपुर तथा साहित्यकार चोवाराम वर्मा ‘बादल’ शामिल रहे।
सम्मान समारोह के दौरान साहित्यकारों एवं भाषा-सेवियों के योगदान को स्मरण करते हुए उनके द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए किए गए कार्यों की सराहना की गई। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके साहित्य, लोक परंपराओं और उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले लोगों से निर्मित होती है। छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास में साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों, कलाकारों और भाषा-सेवियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित 26 पुस्तकों का विमोचन रहा। इन पुस्तकों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने के साथ-साथ प्रदेश की लोकभाषा, लोकसंस्कृति और साहित्यिक परंपरा को दस्तावेज के रूप में संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है।
वक्ताओं ने कहा कि पुस्तकों का प्रकाशन केवल साहित्य के सृजन और संरक्षण का कार्य नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी है। राजभाषा आयोग द्वारा प्रकाशित पुस्तकों से छत्तीसगढ़ी साहित्य के विविध पक्षों को सामने लाने और प्रदेश के रचनाकारों को व्यापक मंच प्रदान करने में मदद मिलेगी।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के अधिष्ठाता कला संकाय एवं विभागाध्यक्ष प्रो. राजन यादव ने जानकारीपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के परस्पर संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए छत्तीसगढ़ी भाषा की साहित्यिक परंपरा, उसकी समृद्ध अभिव्यक्ति और वर्तमान समय में उसके संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह किसी समाज की पहचान, इतिहास, संस्कृति, संवेदनाओं और सामूहिक स्मृतियों को अपने भीतर संजोए रखती है। इसलिए छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्य को समृद्ध करना प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने के समान है।
राजभाषा आयोग के कार्यालय स्थापना दिवस समारोह में प्रदेश के अलग-अलग अंचलों से साहित्यकारों की सहभागिता रही। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पित रचनाकारों ने एक-दूसरे से संवाद किया तथा भाषा के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार साझा किए।
कार्यक्रम ने छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यिक संसार को एक साझा मंच प्रदान किया, जहां वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव, नवोदित रचनाकारों की ऊर्जा और भाषा-सेवियों का समर्पण एक साथ दिखाई दिया। आयोजन के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार के संकल्प को भी मजबूती मिली।
राजभाषा आयोग का कार्यालय स्थापना दिवस समारोह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा कि इसमें सम्मान, साहित्य और प्रकाशन तीनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति मिली। 26 पुस्तकों का विमोचन और भाषा-सेवियों का सम्मान छत्तीसगढ़ी भाषा एवं साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया।

 

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