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मेडटेक में भारत को ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़कर डिजाइन, इनोवेशन और निर्यात का केंद्र बनना होगा: डॉ. जितेंद्र सिंह

In the medtech sector, India must move beyond ‘Make in India’ to become a hub for design, innovation, and exports: Dr. Jitendra Singh

नई दिल्ली। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि भारत को मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में केवल ‘मेड इन इंडिया’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘भारत में डिजाइन, इनोवेशन और भारत से निर्यात’ की दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि मेडिकल टेक्नोलॉजी स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण बनाने के साथ-साथ देश में नवाचार और स्वदेशी विनिर्माण को नई गति दे सकती है।
डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली में फार्मास्यूटिकल्स विभाग के सहयोग से आयोजित 18वें CII ग्लोबल मेडटेक समिट को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत के सामने एक साथ दो बड़ी चुनौतियों का समाधान करने का अवसर है—स्वास्थ्य सेवा की सीमाओं को आगे बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना कि नई तकनीक और उपचार हर नागरिक तक किफायती दरों पर पहुंचें।
उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के सामने एक ऐसा मॉडल पेश कर सकता है, जिसमें उच्च गुणवत्ता, अत्याधुनिक तकनीक और व्यापक प्रभाव के साथ लोगों की वहन क्षमता का भी ध्यान रखा जाए। उन्होंने बताया कि भारत का मेडटेक क्षेत्र वर्ष 2030 तक करीब 20 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यह भारत को मेडिकल टेक्नोलॉजी, नवाचार और विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने का बड़ा अवसर प्रदान करता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की महत्वाकांक्षा केवल एक बड़े उपभोक्ता बाजार तक सीमित नहीं होनी चाहिए। डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में देश की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अगस्त 2026 तक 96.43 करोड़ से अधिक आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) बनाए जा चुके हैं। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत 5.47 लाख से अधिक स्वास्थ्य सुविधाएं और 10.50 लाख से अधिक स्वास्थ्य पेशेवर पंजीकृत हैं।
उन्होंने कहा कि अब अगला कदम मेडिकल टेक्नोलॉजी को डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम के साथ सहज रूप से जोड़ना है। मेडटेक, डिजिटल हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरऑपरेबल हेल्थ डेटा का एकीकरण देश में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता को बदल सकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की अगली बड़ी स्वास्थ्य क्रांति सरकार, उद्योग और अकादमिक जगत के सहयोग से आएगी। स्टार्टअप से लेकर अस्पतालों, प्रयोगशालाओं से लेकर बाजार तक सभी को मिलकर नवाचार को तेज करना होगा, ताकि नई तकनीक का लाभ हर मरीज तक पहुंच सके।
फार्मास्यूटिकल्स विभाग के सचिव मनोज जोशी ने कहा कि मेडिकल डिवाइस के विनिर्माण चरण में ही उत्पादों की पर्याप्त जांच सुनिश्चित करने के लिए नियामकीय व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में अपनी जरूरतों के अनुरूप एक विशिष्ट यानी ‘सुई जेनेरिस’ नियामकीय ढांचा विकसित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि सरकार अगली पीएलआई योजनाओं को अधिक घरेलू वैल्यू एडिशन पर केंद्रित करने की तैयारी कर रही है। मौजूदा लाभार्थियों के लिए वैल्यू एडिशन की सीमा को शुरुआती निम्न स्तरों से बढ़ाकर 40 से 45 प्रतिशत तक ले जाने का प्रस्ताव है, जबकि ऐसे नए उत्पादों के विनिर्माताओं को शुरुआती स्तर पर वैल्यू एडिशन की अनिवार्यता से छूट दी जा सकती है, जिनका उत्पादन वर्तमान में भारत में नहीं हो रहा है।
नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. एम. श्रीनिवास ने कहा कि मेडटेक केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा का एक रणनीतिक स्तंभ है। उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले और जीवनरक्षक उपकरण विकसित करने के लिए उद्योग-अकादमिक साझेदारी को मजबूत करने तथा अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया।
वहीं, CDSCO के ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने बताया कि ICMR और CDSCO के सहयोग तथा नीति आयोग के मार्गदर्शन में चल रहे MedTech Mitra को अब तक 850 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि इससे स्पष्ट है कि नवाचार और मेडिकल डिवाइस के क्षेत्र में बाधाओं को दूर करने के लिए ऐसे और प्लेटफॉर्म की जरूरत है।
उन्होंने उद्योग से उन्नत मेडिकल डिवाइस को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल हेल्थ की वास्तविक सफलता तभी होगी, जब अत्याधुनिक स्वास्थ्य तकनीक देश के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक भी पहुंचे।
फार्मास्यूटिकल्स विभाग के संयुक्त सचिव अमन शर्मा ने मेडिकल डिवाइस के लिए देश में मजबूत परीक्षण इकोसिस्टम विकसित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक परीक्षण सुविधाएं देश में उपलब्ध होनी चाहिए, क्योंकि विदेशों में परीक्षण कराने से भारतीय निर्माताओं की लागत बढ़ती है।
CII नेशनल मेडिकल टेक्नोलॉजी फोरम के चेयरमैन और Terumo India के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक शिशिर अग्रवाल ने कहा कि भारत के मेडटेक क्षेत्र की अगली विकास यात्रा विनिर्माण क्षमता बढ़ाने से आगे बढ़कर डिजाइन, नवाचार, विकास और भारत से निर्यात पर केंद्रित होनी चाहिए। उन्होंने नियामकीय प्रक्रियाओं में अधिक पूर्वानुमेयता और उद्योग, अकादमिक जगत, स्टार्टअप तथा अनुसंधान केंद्रों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।

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