छत्तीसगढ़राज्य

वैज्ञानिक पशुपालन बना आत्मनिर्भरता का आधार, डेयरी उद्यमी बनीं प्रेम कुमारी

Scientific animal husbandry becomes the foundation of self-reliance; Prem Kumari becomes a dairy entrepreneur.

​रायपुर: ग्रामीण अंचल में जब दृढ़ इच्छाशक्ति को आधुनिक तकनीक का साथ मिलता है, तो सफलता की एक ऐसी इबारत लिखी जाती है जो पूरे समाज को नई राह दिखाती है। कुछ ऐसी ही प्रेरणादायी कहानी है सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला ब्लॉक अंतर्गत ग्राम कंचनपुर की निवासी प्रेम कुमारी सारथी की, जिन्होंने पारंपरिक पशुपालन से आगे बढ़कर वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाया और आज वे एक सफल डेयरी उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
प्रेम कुमारी की इस सफलता की नींव रखी पशुपालन विभाग की कृत्रिम गर्भाधान तकनीक ने। विभागीय डॉक्टरों के मार्गदर्शन में किए गए कृत्रिम गर्भाधान से जो बछिया पैदा हुईं, वे आज उच्च उत्पादक दुधारू गायों का रूप ले चुकी हैं। वर्तमान में उनके पास एचएफ और जर्सी नस्ल की 5 दुधारू गायें हैं, जो उनकी डेयरी व्यवसाय की रीढ़ बनी हुई हैं।
​तकनीक और सही देखभाल का ही परिणाम है कि आज प्रेम कुमारी की डेयरी से प्रतिदिन लगभग 25 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इस दूध को वे बरमकेला स्थित अमृत डेयरी में 40 रुपए प्रति लीटर की दर से आसानी से बेच देती हैं। इससे उन्हें प्रतिमाह लगभग 25 हजार रुपए की नियमित आय प्राप्त हो रही है। इस आर्थिक मजबूती ने न केवल उनके परिवार के जीवन स्तर को सुधारा है, बल्कि उन्हें आत्म-निर्भरता का एक नया अहसास भी दिया है।
​अपनी इस उपलब्धि का श्रेय प्रेम कुमारी पशुधन विकास विभाग और पशु चिकित्सालय बरमकेला की टीम को देती हैं। विभाग द्वारा समय-समय पर कृत्रिम गर्भाधान, नियमित टीकाकरण, कृमिनाशन, स्वास्थ्य परीक्षण और वैज्ञानिक खान-पान से संबंधित जो तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया, उसी की बदौलत उनके पशु स्वस्थ और अत्यधिक उत्पादक बने रहे।
इस बारे में बात करते हुए प्रेम कुमारी उत्साह से कहती हैं कि पशुपालन विभाग के सतत सहयोग और आधुनिक तकनीकों को अपनाने से मेरा डेयरी व्यवसाय आज नई ऊंचाइयों पर है। मुझे खुशी है कि मैं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर पाई हूँ।
आज कंचनपुर की प्रेम कुमारी सारथी अपने आसपास के ग्रामीण पशुपालकों के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। उन्हें देखकर क्षेत्र के कई अन्य किसान और ग्रामीण भी पारंपरिक पशुपालन छोड़ उन्नत नस्ल सुधार और वैज्ञानिक पद्धतियों की ओर प्रेरित हो रहे हैं। उनकी यह सफलता साबित करती है कि अगर सही मार्गदर्शन और विभागीय योजनाओं का लाभ उठाया जाए, तो पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

 

 

 

 

 

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