छत्तीसगढ़राज्य

घुमड़ते बादलों के बीच मुक्ताकाशी मंच पर साकार हुआ ‘पावस प्रसंग’

'Pavas Prasang' comes to life on the open-air stage amidst gathering clouds.

रायपुर: राजधानी रायपुर के मुक्ताकाशी मंच पर घुमड़ते बादलों, सावन की फुहारों और सुर-ताल की मनोहारी संगति के बीच ‘पावस प्रसंग’ का भव्य सांस्कृतिक आयोजन हुआ। प्रकृति के मनोहारी परिवेश में शास्त्रीय नृत्य और संगीत की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने वर्षा ऋतु की अनुभूतियों को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम के दौरान वातावरण कभी बादलों की गरज से गूंजा तो कभी शास्त्रीय सुरों और घुंघरुओं की झंकार से संगीतमय हो उठा।
पावस प्रसंग’ में वर्षा ऋतु के विविध भावों को कथक नृत्य और शास्त्रीय गायन के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में शाश्वती बैनर्जी ने कथक नृत्य की भावपूर्ण प्रस्तुति से सावन की उमंग, बादलों की गरज और वर्षा की रिमझिम को नृत्य मुद्राओं के माध्यम से साकार किया। उनकी प्रस्तुति में भाव, लय और ताल का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
इसके साथ ही मेघा बोस ने शास्त्रीय गायन की मनोहारी प्रस्तुति दी। उनके सुमधुर स्वरों ने पावस ऋतु की कोमल अनुभूतियों को स्वर प्रदान किया और उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मुक्ताकाशी मंच पर शास्त्रीय संगीत की यह प्रस्तुति विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र रही।
इशिका गिरी ने भी कथक नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। उनकी नृत्य प्रस्तुति में शास्त्रीय नृत्य की बारीकियों के साथ वर्षा ऋतु के उल्लास और सौंदर्य का प्रभावी चित्रण दिखाई दिया। वहीं मेवाती घराने के शास्त्रीय गायक श्री प्रदीप कुमार चौबे ने अपनी सुमधुर गायकी से पावस ऋतु की अनुभूतियों को सुरों में पिरोया। उनकी प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को सुरमयी बना दिया।
कार्यक्रम के दौरान साहित्य परिषद के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने मंच पर प्रतिभागी कलाकारों को सम्मानित किया। उन्होंने कलाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय शास्त्रीय कला परंपरा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है और कला के प्रति नई पीढ़ी की रुचि भी बढ़ती है।
कार्यक्रम के संचालक डॉ. संजय कनौजे ने भी कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने प्रस्तुतियों की प्रशंसा करते हुए कलाकारों को विभिन्न मंचों पर सम्मान और प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कला और संस्कृति समाज को संवेदनशील बनाने के साथ हमारी परंपराओं को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
कार्यक्रम में उप संचालक उमेश मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार एवं फोटोग्राफर दीपेंद्र दीवान तथा उदयभान सिंह सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी, श्रोता और दर्शक उपस्थित रहे। खुले आकाश के नीचे बादलों से घिरे मनोहारी वातावरण में शास्त्रीय संगीत और कथक की प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों को पावस ऋतु के सौंदर्य का अनूठा अनुभव कराया।
‘पावस प्रसंग’ की शाम प्रकृति और कला के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। एक ओर आसमान में घुमड़ते बादल और सावन की फुहारें थीं, तो दूसरी ओर मंच पर कथक की लय, घुंघरुओं की झंकार और शास्त्रीय गायन के मधुर सुर। कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने सावन के रंग, उमंग और संवेदनाओं को इस तरह साकार किया कि मुक्ताकाशी मंच पर पावस केवल मौसम नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभूति बन गया।

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