छत्तीसगढ़राज्य

अबुझमाड़ की नई सुबह: जब जंगलों की छांव से निकलकर स्वावलंबन की मिसाल बनीं नारायणपुर की महिलाएं

A New Dawn for Abujhmarh: When Women of Narayanpur Emerged from the Forest Shade to Become Examples of Self-Reliance

रायपुर: ​बस्तर के सुदूर और दुर्गम अबुझमाड़ के जंगलों से अब बदलाव की एक नई बयार बह रही है। कभी नक्सल के साए और सिर्फ घरेलू चौखट तक सीमित रहने वाली नारायणपुर तथा ओरछा विकासखण्ड की ग्रामीण महिलाएं अब अपने हौसले और कड़ी मेहनत से आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। वन विभाग की एक दूरदर्शी पहल ने इन महिलाओं के सपनों को न सिर्फ पंख दिए हैं, बल्कि चक्रिय निधि के माध्यम से उन्हें वित्तीय संबल देकर सफल उद्यमी के रूप में उभारने का काम किया है।
वर्ष 2026-27 में शासन की मंशानुरूप क्षेत्र के 10 महिला स्व-सहायता समूहों को 37 लाख रुपये की चक्रिय निधि से ऋण उपलब्ध कराया गया। इस आर्थिक मदद ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नई जान फूंक दी। जय बिहान, जगदम्बा, मां लक्ष्मी, मां शीतला, मां दंतेश्वरी, मां दुर्गा, मां सरस्वती, मां अम्बे और जय वाला कारयो जैसे समूहों से जुड़ी दीदियां आज विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी हैं। कोई जंगलों से इमली और माहुल पत्ता चुनकर दोना-पत्तल बना रही है, तो कोई कच्चे फूलझाड़ू का प्रसंस्करण कर बाजार तक पहुंचा रही है। गृह उद्योग के तहत मसाला निर्माण, बेकरी, कैंटीन और किराना स्टोर के सफल संचालन से इन महिलाओं ने साबित कर दिया है कि अवसर मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में कमाल कर सकती हैं।
​इस बदलाव का सबसे खूबसूरत पहलू इन परिवारों के जीवन में आई खुशहाली है। स्वरोजगार से मिल रही नियमित आय ने महिलाओं के भीतर न केवल आत्मविश्वास जगाया है, बल्कि अब वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं देने में सक्षम हो पाई हैं। समाज की मुख्यधारा से जुड़कर आर्थिक रूप से मजबूत होतीं अबुझमाड़ की ये महिलाएं आज पूरे छत्तीसगढ़ के लिए महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं।

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